मातृत्व के बाद खेल में वापसी के लिए समान नीति की मांग—रैंकिंग और चयन में संरक्षण, वैकल्पिक रास्ते और तय प्रतियोगिता कैलेंडर चाहती हैं पहलवान
नई दिल्ली, 2 सितंबर। क्या किसी महिला खिलाड़ी का मां बनना उसके खेल करियर के लिए ब्रेक ही नहीं, बल्कि चयन और रैंकिंग में पिछड़ने की वजह भी बन सकता है? पहलवान विनेश फोगाट ने इसी सवाल को दिल्ली हाई कोर्ट के सामने रखा है। उनकी याचिका पर अदालत ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई), केंद्र सरकार और भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) से जवाब मांगा है।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए महिला खिलाड़ियों के लिए गर्भावस्था, प्रसव और मातृत्व अवकाश के बाद प्रतियोगी खेल में वापसी की निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यवस्थित व्यवस्था बनाने की मांग पर नोटिस जारी किया। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी।
जिस अवधि में खेल नहीं सकतीं, उसी का प्रदर्शन कैसे देंगी?
विनेश फोगाट की याचिका का मूल सवाल चयन व्यवस्था को लेकर है। उनका कहना है कि गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद स्वास्थ्य लाभ के दौरान महिला खिलाड़ी स्वाभाविक रूप से प्रतियोगिताओं से बाहर रहती है। लेकिन वापसी के बाद यदि चयन के लिए उसी अवधि के टूर्नामेंटों के प्रदर्शन को आधार बनाया जाए, तो खिलाड़ी को ऐसी प्रतियोगिताओं का नुकसान उठाना पड़ता है, जिनमें वह मातृत्व के कारण हिस्सा ही नहीं ले सकती थी।
विनेश ने अपने मामले को इसका उदाहरण बनाया है। उन्होंने कहा कि बच्चे के जन्म के बाद कुश्ती में वापसी पर उन्हें सामान्य प्रतियोगी प्रक्रिया में वापस आने को कहा गया, लेकिन मातृत्व के कारण प्रतियोगिता से दूर रहने की अवधि के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया। याचिका के अनुसार, इस व्यवस्था ने उन्हें ऐसी स्थिति में डाल दिया, जिसमें वापसी के बावजूद चयन की दौड़ में उनके पास सामान्य खिलाड़ियों के मुकाबले कम अवसर थे।
रैंकिंग बचाने से लेकर चयन तक की मांग
विनेश ने अदालत से महिला खिलाड़ियों के लिए एक ऐसी नीति बनाने का आग्रह किया है, जिसमें मातृत्व के कारण खेल से दूर रहने पर उनकी रैंकिंग और चयन की संभावनाएं अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।
याचिका में पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ चयन प्रक्रिया के साथ-साथ मातृत्व के कारण प्रतियोगिताओं से अनुपस्थित रहने वाली खिलाड़ियों के लिए वैकल्पिक चयन व्यवस्था की मांग की गई है। इसके अलावा ऐसी खिलाड़ी, जो किसी प्रतियोगिता के लिए अन्यथा पात्र है, उसे केवल मातृत्व के कारण अवसर से वंचित नहीं किए जाने और घरेलू प्रतियोगिताओं का निश्चित एवं समयबद्ध कैलेंडर बनाए जाने की मांग भी की गई है।
मामला विनेश से आगे का
विनेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने अदालत में कहा कि यह याचिका केवल एक खिलाड़ी को राहत देने का मामला नहीं है, बल्कि महिला खिलाड़ियों और मातृत्व के बीच मौजूद उस नीति संबंधी खाई का सवाल है, जिसका सीधा असर उनके खेल करियर पर पड़ता है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद ऐसी व्यवस्थाओं का भी हवाला दिया, जिनमें मातृत्व अवकाश लेने वाली खिलाड़ियों को रैंकिंग सहित कुछ मामलों में संरक्षण दिया जाता है।
विनेश ने 1 जुलाई 2025 को अपने पहले बच्चे को जन्म दिया था। इसके बाद उन्होंने प्रतिस्पर्धी कुश्ती में वापसी की कोशिश की। ऐसे में उनकी याचिका का महत्व केवल उनके व्यक्तिगत करियर तक सीमित नहीं है। अदालत में उठाया गया सवाल देश की उन महिला खिलाड़ियों से जुड़ता है, जिन्हें खेल और मातृत्व में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए।
पहले भी चयन प्रक्रिया को लेकर आमने-सामने आ चुके हैं विनेश और डब्ल्यूएफआई
यह पहली बार नहीं है जब विनेश और डब्ल्यूएफआई का विवाद अदालत पहुंचा है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें एशियाई खेलों के चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दी थी। अदालत ने चयन प्रक्रिया को वीडियो रिकॉर्ड करने और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की निगरानी में कराने का निर्देश भी दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रायल में हिस्सा लेने की उनकी राह नहीं रोकी।
इस पूरे घटनाक्रम ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और मातृत्व के बाद महिला खिलाड़ियों की वापसी के सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
कारण बताओ नोटिस का विवाद भी अलग से अदालत में
इसी बीच विनेश ने डब्ल्यूएफआई की ओर से जारी दो कारण बताओ नोटिस और उनके आधार पर शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को भी चुनौती दी है। ये नोटिस 9 मई और 17 जून को जारी किए गए थे। इस मामले में हाई कोर्ट ने डब्ल्यूएफआई से उसका पक्ष जानने को कहा है और अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
विनेश का आरोप है कि इन कार्रवाइयों का असर उनकी प्रतिस्पर्धी कुश्ती में वापसी और भविष्य की प्रतियोगिताओं में पात्रता पर पड़ सकता है। हालांकि यह मामला मातृत्व नीति वाली याचिका से अलग है।
अब अदालत के सामने बड़ा सवाल
विनेश फोगाट की याचिका मूलतः एक सीधा सवाल अदालत के सामने रखती है—अगर कोई महिला खिलाड़ी मां बनने के कारण कुछ समय प्रतियोगिता से बाहर रहती है, तो वापसी के बाद उसके साथ सामान्य खिलाड़ी जैसा ही व्यवहार क्यों किया जाए, जबकि वह सामान्य परिस्थितियों में प्रतियोगिता से बाहर नहीं होती?
यदि इस मामले में कोई स्पष्ट नीति बनती है तो उसका असर केवल कुश्ती पर नहीं, बल्कि अन्य प्रतिस्पर्धी खेलों में भी पड़ सकता है। भारत में महिला खिलाड़ियों के लिए मातृत्व और खेल करियर के बीच संतुलन की औपचारिक व्यवस्था बनाने की दिशा में यह मामला एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
