- आलेख – भगवती प्रसाद मिश्र

श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू शिवनाथ नदी की दो धाराओं के परिवृत से निर्मित एक प्राकृतिक नदी द्वीप है। पुरातात्विक सर्वेक्षण में इस स्थान से पाषाण काल के औजार प्राप्त हुए हैं। इण्डियन एपिग्राफी सर्वे 1959-60 में शंख लिपि एवं ब्राम्ही लिपि के दो शिलालेख प्राप्त हुए हैं, जो श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू के इतिहास को दसवीं शताब्दी से तीसरी शताब्दी तक विस्तार देती है।
श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू की अनेक विशिष्टताएं और अनेक प्रचलित किंवदंतियां है।
नदी में डूबा हुआ मंदिर

श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू के पूर्व दिशा की ओर, जहां शिवनाथ की दो धाराएं आकर मिलती है, जिसे चुनिया घाट या दहरा के रूप में जानते हैं, इस दहरा में एक प्राचीन मंदिर के होने संबंधी किंवदंती है। पुराने लोगों के बीच इसके संबंध में एक दंतकथा भी प्रचलित है कि एक मछुआरे का जाल मछली पकड़ने के दौरान नदी के अंदर किसी चीज में फंस गया। मछुआरा जब जाल निकालने नदी के अंदर गया तो ये देखकर हतप्रभ रह गया कि उसका जाल प्राचीन मंदिर के कलश में फंसा हुआ है, और नदी के अंदर मंदिर ही नहीं एक आश्रम है, जिसमें साधु संत निवास करते हैं। एक साधु ने उसे आश्रम में आश्रय दिया। कुछ दिन रहने के बाद जब वो वापस आने लगा तो साधु ने आश्रम और मंदिर का रहस्य बाहर जाकर नहीं बताने की शर्त पर उसे बाहर आने दिया, किन्तु मछुआरे ने मंदिर और आश्रम की कहानी अपनी पत्नी से कह दी फिर वो कहानी सभी तक विस्तारित हो गई। वैसे तो तर्क की कसौटी पर पानी के अंदर आश्रम और साधुओं के होने कि कथा कपोल कल्पित लगती है, किन्तु नदी के अंदर मंदिर के अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। इसी लोक श्रृति के आधार पर पुराविद पद्मश्री डॉ अरूण शर्मा जी ने चुनिया घाट के पानी के अंदर के मंदिर की खोज आधुनिक यंत्रों के माध्यम से करने की बात कही थी,किन्तु बात आगे बढ़ नहीं पाई और यह सर्वेक्षण नहीं हो पाया।यदि यह सर्वेक्षण हुआ होता तो मदकू द्वीप के पुरातात्विक वैभव का एक और अध्याय उद्घाटित हो पाता। जो हो ना सका।
भगवान राम का आगमन
भगवान राम ने अपने चौदह वर्ष के वनवास काल का अधिकांश समय छत्तीसगढ़ में ही व्यतीत किया था।
ऐसा माना जाता है कि अपने वनवास काल के समय भगवान राममाँ सीता तथा श्री लक्ष्मण के साथ रतनपुर से शिवरीनारायण मदकू द्वीप होते हुये गये थे | शिवनाथ नदी यहीं से आगे जाकर शिवरीनाराण के पास महानदी में मिलती है | हो सकता है कि वे नदी के किनारे-किनारे शिवरीनारायण गये हों उसके बाद महानदी के साथ तुरतुरिया होते हुये राजिम की ओर गये थे | मदकू द्वीप की महत्ता को देखते हुये यह असंभव ही है कि भगवान राम इस क्षेत्र से जायें और इस पावन द्वीप में ना आयें | राम वन गमन मार्ग के संबंध में शोध करने वाले छत्तीसगढ़ रामायण की रचना करने वाले डॉ मन्नू लाल यदु के अनुसार भगवान राम अपने वनवास काल में दो बार मदकू द्वीप आए थे।
बाढ़ की सूचना देने वाले भगवान धूमनाथ
श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू में प्राप्त पुरावशेष, शिलालेख और विग्रह इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि मदकू द्वीप प्राचीन काल में धर्म, संस्कृति, अध्यात्म और आस्था का एक बड़ा केन्द्र था। पुराविदों के अनुसार लगभग 200 वर्ष पूर्व शिवनाथ नदी में आई तेज बाढ़ के प्रवाह से द्वीप क्षेत्र के मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए। बाढ़ के साथ आई मिट्टी ने पुरावशेषों को ढंक दिया। कालांतर में उस स्थान पर सिरहुट,बकुल के वृक्ष उग आए और जनमानस ने भी इसे विस्मृत कर दिया।

लगभग 150 वर्ष पूर्व द्वीप क्षेत्र जो गहन वन क्षेत्र था, ग्रामीणों का आना जाना प्रारंभ हुआ, तब कुछ ग्रामीणों द्वारा वर्तमान प्राचीन मंदिर वाले स्थान पर मलबे के ढेर पर रखे दो बड़े शिलाखंड की सफाई करने पर प्राचीन अष्टभुजी भगवान गणेश और भगवान धूमनाथ की प्रतिमा प्राप्त हुई। श्रद्धालुओं ने उक्त दोनों प्रतिमाओं को दो छोटी-छोटी मढ़िया में स्थापित कर पूजन-अर्चन प्रारंभ कर दिया। श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप सेवा समिति मदकू द्वारा स्थानीय खदानों के पाषाण खंडों से मंदिर का निर्माण कर 2021 में प्राचीन अष्टभुजी भगवान गणेश को मंदिर में स्थापित कर दिया गया।
वर्तमान में भगवान धूमनाथ अपनी छोटी मढ़िया में ही स्थापित है। भगवान धूमनाथ के प्रति आसपास के ग्रामों में बड़ी आस्था है। ग्रामीणों के अनुसार भगवान धूमनाथ आसपास के गांवों मदकू,ठेलकी,बड़ियाडीह,अकोली,परसवानी के ग्रामीणों के मध्य बाढ़ की सूचना देकर अनहोनी से बचाने वाले देवता के रूप में पूजित हैं। आसपास के ग्रामीणों के अनुसार जब भी शिवनाथ नदी में कोई बड़ी बाढ़ आई है, उसके पूर्व भगवान धूमनाथ ने बाढ़ आने की चेतावनी देकर ग्रामीणों की बाढ़ से रक्षा की है। हालांकि तर्क की कसौटी पर ऐसी बातें विश्वास करने योग्य नहीं लगती किंतु आस्था भी तर्कातीत है।
श्री हरिहर क्षेत्र केदार मदकू द्वीप प्रकृति, आध्यात्मिकता और सनातन परंपरा का अद्वितीय संगम है। शिवनाथ नदी की दो धाराओं से परिवृत यह प्राकृतिक नदी द्वीप प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों की तपोभूमि, साधकों की आराधना-स्थली तथा धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमुख केंद्र रहा है। इसकी भौगोलिक संरचना और आध्यात्मिक वातावरण इसे साधना एवं उपासना के लिए अनुकूल बनाती हैं।
साधना का तीव्र फल देने वाला पवित्र स्थल

यहाँ शिवनाथ नदी दक्षिण दिशा से प्रवाहित होकर उत्तर-पूर्व अर्थात् ईशान कोण की ओर मुड़ जाती है। भारतीय वास्तुशास्त्र एवं सनातन परंपरा में ईशान कोण को देवत्व, ज्ञान, आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। जिस स्थान पर नदी ईशान दिशा की ओर प्रवाहित होती है, वह क्षेत्र विशेष रूप से पवित्र, शुभ एवं साधना-सिद्धि के लिए अनुकूल माना जाता है।
प्राचीन काल में नगरों, राजधानियों, देवालयों तथा साधना स्थल के रूप में ऐसे ही स्थलों का चयन किया जाता था, जहाँ प्राकृतिक ऊर्जा और आध्यात्मिक वातावरण का समन्वय विद्यमान हो। यह विश्वास रहा है कि ईशानमुखी प्रवाहित जलधारा उस क्षेत्र की आध्यात्मिक शक्ति को पुष्ट करती है तथा साधकों के मन को एकाग्र, शांत और निर्मल बनाती है।
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार लगभग 22 अंश के कोण पर प्रवाहित होने वाली नदी अत्यंत शुभ मानी जाती है। अयोध्या में सरयू नदी का प्रवाह लगभग 22 अंश तथा प्रयागराज में गंगा-यमुना संगम क्षेत्र लगभग 23 अंश के कोण पर स्थित माना जाता है। इसी प्रकार मदकू द्वीप में भी शिवनाथ नदी का प्रवाह लगभग 22 अंश के कोण पर ईशान दिशा की ओर होता है। यही विशेषता इस स्थल को प्राचीन काल से ही साधकों के लिए आध्यात्मिक दृष्टि से विशिष्ट बनाती रही है।
ऐतिहासिक एवं धार्मिक परंपराओं से ज्ञात होता है कि मदकू द्वीप में विभिन्न कालखंडों में यज्ञ, हवन, देवपूजन, तप, जप तथा वैदिक अनुष्ठानों का आयोजन होता रहा। ऋषि-मुनियों ने इसे तपश्चर्या के लिए उपयुक्त भूमि के रूप में स्वीकार किया। प्राकृतिक नीरवता, नदी का पावन प्रवाह तथा दिव्य वातावरण साधकों को आत्मिक शांति एवं ईश्वर-सान्निध्य का अनुभव कराते हैं। इसी कारण मदकू द्वीप को केवल एक प्राकृतिक अथवा पुरातात्त्विक स्थल नहीं, बल्कि साधना का तीव्र फल प्रदान करने वाली दिव्य तपोभूमि के रूप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त है। यहाँ आस्था, विश्वास और सात्त्विक भाव से की गई उपासना, जप, ध्यान एवं आराधना साधक को आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रवृत्त करती है।
आज आवश्यकता है कि इस पावन आध्यात्मिक धरोहर के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समाज और शासन मिलकर प्रयास करें, जिससे आने वाली पीढ़ियाँ भी इस दिव्य तपोभूमि की आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव लाभ प्राप्त कर सके।
राधाकृष्ण मंदिर का निर्माण और दानदाता वृंदा बाई

श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू केवल प्राकृतिक सौंदर्य और पुरातात्त्विक महत्त्व का केंद्र ही नहीं, बल्कि त्याग, श्रद्धा, सेवा और लोक आस्था की जीवंत परंपराओं का भी विशिष्ट उदाहरण है।
इस पावन द्वीप से जुड़ी अनेक लोक श्रुतियाँ आज भी स्थानीय समाज की स्मृतियों में सुरक्षित हैं। इन्हीं में से एक प्रेरणादायक प्रसंग राधाकृष्ण मंदिर के निर्माण तथा उसकी दानदाता वृंदा बाई के संबंध में है, जो धार्मिक समर्पण और लोकसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।
लगभग एक शताब्दी पूर्व, श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू की प्राकृतिक रमणीयता, शांत वातावरण तथा साधना के लिए अनुकूल आध्यात्मिक परिवेश से प्रभावित होकर एक सिद्ध संत ने इस पवित्र स्थल पर एक विराट वैदिक यज्ञ के आयोजन का संकल्प लिया। उस समय आसपास के ग्रामों के श्रद्धालुओं ने तन, मन और धन से सहयोग प्रदान किया। जनसहभागिता और सामूहिक आस्था के परिणाम स्वरूप विराट यज्ञ पूरी भव्यता के संपन्न हुआ। इस आयोजन ने न केवल क्षेत्र की धार्मिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान की, बल्कि मदकू द्वीप की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को भी सुदृढ़ किया।
यज्ञ के दौरान निकटवर्ती ग्राम कोटमी के प्रतिष्ठित क्षत्रिय परिवार की बाल विधवा श्रद्धेय वृंदा बाई (कतकहिन दाई) संत के सान्निध्य में पहुँचीं। संत ने उनकी भगवद प्रेम और धर्मनिष्ठा को देखकर उन्हें इस पवित्र द्वीप पर भगवान श्रीराधाकृष्ण का मंदिर निर्माण कराने की प्रेरणा प्रदान की। संत की आज्ञा को उन्होंने ईश्वरीय आदेश मानकर पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ राधाकृष्ण मंदिर के निर्माण का दायित्व स्वीकार किया।
वृंदा बाई के अथक प्रयासों और समर्पण की भावना से द्वीप क्षेत्र में भगवान श्रीराधाकृष्ण का भव्य मंदिर का निर्माण संपन्न हुआ। यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे संपूर्ण क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख आधार बन गया। इस मंदिर ने मदकू द्वीप की आध्यात्मिक पहचान को नई दिशा प्रदान की और श्रद्धालुओं के लिए भक्ति एवं साधना का स्थायी केंद्र स्थापित किया।
वृंदा बाई की दूरदर्शिता का परिचय मंदिर निर्माण के पश्चात और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने यह भली-भाँति समझ लिया था कि केवल मंदिर का निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसकी नियमित पूजा, संरक्षण तथा धार्मिक आयोजनों की निरंतरता के लिए स्थायी आर्थिक व्यवस्था भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक ट्रस्ट की स्थापना कर पर्याप्त कृषि भूमि मंदिर के नाम समर्पित कर दी। इस दान की आय से मंदिर में नित्य पूजन, भोग, दीप-आराधना, उत्सव तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन बिना किसी आर्थिक अभाव के निरंतर होता रहे। यह व्यवस्था उस युग में धार्मिक संस्थाओं के स्थायी संरक्षण का अत्यंत अनुकरणीय उदाहरण मानी जा सकती है।
समय के साथ यह मंदिर क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र बन गया। यहाँ नवधा रामायण पाठ, पौष पूर्णिमा के अवसर पर सात दिवसीय मेला, शिवपुराण कथा, भजन-कीर्तन, सत्संग तथा विविध धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित होने लगे।
इन आयोजनों ने न केवल स्थानीय समाज को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया, बल्कि विभिन्न ग्रामों के लोगों को एक सूत्र में बाँधने का कार्य भी किया। मदकू द्वीप का यह मंदिर सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक संरक्षण और धार्मिक जागरण का प्रेरणास्रोत बन गया
सी कालखंड में मोहभट्ठा ग्राम के विद्वान ब्राह्मण स्वर्गीय पंडित रामस्नेही पाठक काशी से संस्कृत की शिक्षा पूर्ण कर अपने गृहग्राम लौटे। उन्होंने पौष पूर्णिमा मेले के अवसर पर आजीवन भगवान शिव की महिमा का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष शिवपुराण कथा का वाचन एवं श्रवण कराने का आजीवन संकल्प लिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय तक इस संकल्प का निष्ठापूर्वक पालन किया और हजारों श्रद्धालुओं को शिवभक्ति तथा सनातन संस्कृति का संदेश प्रदान किया।
धर्म और परंपरा की यह अखंड ज्योति आज भी प्रज्वलित है। स्वर्गीय पंडित रामस्नेही पाठक के पौत्र पंडित रवि पाठक अपने पूज्य दादा के संकल्प को उसी श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। उनके प्रयासों से शिवपुराण कथा की यह परंपरा आज भी निरंतर चल रही है और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत से जोड़ रही है।
राधाकृष्ण मंदिर के निर्माण की यह जनश्रुति केवल एक मंदिर की स्थापना का इतिहास नहीं है, बल्कि यह लोक-आस्था, संत परंपरा, नारी-शक्ति, दानशीलता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रेरणादायी अध्याय है। श्रद्धेय वृंदा बाई का त्याग और दूरदर्शिता यह संदेश देती है कि जब धर्म, सेवा और समाजहित की भावना एक साथ जुड़ती है, तब उनके द्वारा निर्मित संस्थाएँ शताब्दियों तक समाज का मार्गदर्शन करती रहती हैं।
