प्रयागराज मंडल में सोलर-असिस्टेड कोच का पायलट प्रोजेक्ट, सालाना 13,400 यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान
नई दिल्ली, 9 अगस्त 2026। भारतीय रेल ने यात्री कोचों में नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल की दिशा में नई पहल की है। उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज मंडल में एक आईसीएफ नॉन-एसी यात्री कोच को सोलर-असिस्टेड कोच के रूप में विकसित किया गया है। कोच की छत पर करीब 7 किलोवाट-पीक (kWp) क्षमता का रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाया गया है।
इस पायलट परियोजना का उद्देश्य कोच में बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए पारंपरिक विद्युत उत्पादन प्रणाली पर निर्भरता कम करना और स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।

कैसे अलग है सोलर कोच?
परंपरागत आईसीएफ यात्री कोचों में बिजली उत्पादन के लिए कोच के नीचे लगे एक्सल-चालित अल्टरनेटर का इस्तेमाल होता है। ट्रेन के एक्सल की गति से बेल्ट सिस्टम के जरिए अल्टरनेटर चलता है और बैटरी बैंक को चार्ज करता है। इसी बिजली से कोच की लाइट, पंखे और मोबाइल चार्जिंग जैसी सुविधाएं संचालित होती हैं।
इस व्यवस्था की एक सीमा यह है कि बिजली उत्पादन ट्रेन की गति पर निर्भर रहता है। सोलर-असिस्टेड कोच में इसके साथ एक अतिरिक्त स्रोत जुड़ जाता है। कोच की छत पर लगे सोलर पैनल सूर्य के प्रकाश से बिजली बनाकर बैटरी बैंक की चार्जिंग में योगदान देते हैं।
सालाना 13,400 यूनिट बिजली का अनुमान
रेलवे के अनुसार, इस सोलर सिस्टम से एक कोच में सालाना करीब 13,400 यूनिट (kWh) बिजली पैदा होने का अनुमान है। इससे प्रति कोच प्रति वर्ष लगभग 2.80 लाख रुपये की बचत होने की संभावना है।
परियोजना से प्रति कोच सालाना करीब 11 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी का भी अनुमान है। यानी एक कोच की छत पर उपलब्ध जगह को ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल करते हुए रेलवे अपनी ऊर्जा जरूरतों और पर्यावरणीय प्रभाव—दोनों को कम करने की कोशिश कर रहा है।
अभी पायलट, आगे विस्तार की संभावना
फिलहाल सोलर-असिस्टेड सिस्टम को एक कोच में पायलट आधार पर लगाया गया है। इसके प्रदर्शन, ऊर्जा उत्पादन और संचालन से मिलने वाले अनुभव का आकलन करने के बाद रेलवे अन्य यात्री कोचों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर विचार करेगा।
यह पहल भारतीय रेल के पारंपरिक कोचिंग स्टॉक में नवीकरणीय ऊर्जा तकनीक को जोड़ने का प्रयोग है। यदि पायलट परियोजना अपेक्षित परिणाम देती है तो भविष्य में ऐसे सिस्टम यात्री कोचों की ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और रेलवे के हरित परिवहन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में उपयोगी हो सकते हैं।
