एक साल बाद मासूम की जिंदगी में लौटी मुस्कान
रायपुर, 25 जुलाई 2026, वाय के न्यूज । जिंदगी कभी-कभी ऐसे इम्तिहान लेती है कि अपनों से बिछड़ा बच्चा दुनिया की भीड़ में अकेला रह जाता है। लगभग एक साल पहले बालोद रेलवे स्टेशन पर लावारिस और सहमा हुआ मिला नौ वर्षीय ‘समीर’ (बदला हुआ नाम) भी कुछ ऐसी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा था। न घर का पता, न मां-बाप की छांव, बस भटकते कदमों के सहारे एक सफर। लेकिन अब, बाल कल्याण समिति और जिला प्रशासन की पहल ने इस बेघर मासूम को एक नई जिंदगी और अपना परिवार दिला दिया है।
जब हर दरवाजा बंद हो गया, तब जागी उम्मीद की किरण
एक साल पहले जब रेलवे पुलिस ने बच्चे को स्टेशन पर रोते-बिलखते देखा था, तो उसे सुरक्षित बाल कल्याण समिति के सुपुर्द किया गया था। नियम और कानून के तहत बच्चे के मां-बाप और परिजनों को तलाशने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों में इश्तहार छपवाए गए थे, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र ने दूर-दूर तक छानबीन की थी। महीने बीतते गए, लेकिन कोई दावेदार सामने नहीं आया था। ऐसा लगा कि शायद बच्चे का कोई नहीं है।
चार महीने की तलाश और फिर मिला सहारा
लेकिन कानून और इंसानियत दोनों ने हार नहीं मानी थी। बालक के हित को ध्यान में रखते हुए, बाल कल्याण समिति ने एक परिवार खोजने का बीड़ा उठाया था जो बच्चे को अपनी संतान की तरह स्नेह और सुरक्षा दे सके।
लगभग चार महीने के निरंतर प्रयासों के बाद, बिलासपुर जिले के रतनपुर से उम्मीद की किरण नजर आई थी। वहां के धीवर परिवार ने खुले दिल से बच्चे को ‘अपनानै की इच्छा जताई थी। जिला बाल संरक्षण इकाई की मदद से तमाम कानूनी और सामाजिक औपचारिकताएं पूरी की गई थीं।
नए सफर की शुरुआत
जब विधिवत रूप से पुनर्वास आदेश और बच्चे को नए परिवार के हाथों में सौंपा गया, तो हर किसी की आंख में सुकून था। इस मौके पर बच्चे को उपहार भी भेंट किए गए थे, ताकि वह नए घर की दहलीज पर कदम रखते ही अपनापन महसूस कर सके।
बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष कृष्णा साहू और अन्य सदस्यों की मौजूदगी में हुआ यह मिलन सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक बेघर मासूम को उसका हक, उसकी मुस्कान और एक मुकम्मल घर लौटाने की दास्तान थी।
