स्वदेशी MPATGM मौजूद, फिर भी अमेरिका से सौदा; सवाल आत्मनिर्भरता का नहीं, सही समय पर सही क्षमता का
नई दिल्ली, 29 अगस्त 2026। वाय के न्यूज। भारत ने अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल खरीदने का समझौता किया है। भारतीय सेना ने अमेरिका के साथ लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LOA) पर हस्ताक्षर किए हैं। अमेरिकी पक्ष ने इसे दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण कदम बताया है और कहा है कि इससे आगे सह-उत्पादन की संभावनाओं पर काम करने का रास्ता खुल सकता है।
लेकिन इस सौदे की असली कहानी मिसाइल की खरीद से कहीं बड़ी है।
क्योंकि भारत के पास अब अपनी मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल यानी MPATGM है। DRDO ने जनवरी 2026 में स्वदेशी MPATGM का चलती लक्ष्य के खिलाफ टॉप-अटैक क्षमता वाला सफल परीक्षण किया था। इस प्रणाली में इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर, फायर-कंट्रोल सिस्टम, टैंडम वारहेड और अन्य प्रमुख तकनीकें स्वदेशी रूप से विकसित की गई हैं।
तो फिर सवाल उठता है—
जब भारत खुद ऐसी मिसाइल बना रहा है, तब जैवलिन क्यों?
जवाब आत्मनिर्भरता बनाम आयात नहीं
इस सवाल का जवाब शायद “भारत अपनी मिसाइल नहीं बना सकता” में नहीं है।
भारत बना रहा है।
असल सवाल है—स्वदेशी प्रणाली कब पूरी तरह उपलब्ध होगी, कितनी संख्या में उपलब्ध होगी और सेना की तत्काल परिचालन जरूरत कितनी है?
MPATGM का विकास कई वर्षों से चल रहा है और जनवरी 2026 का सफल परीक्षण इसकी विकास यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव था। जुलाई 2026 की रिपोर्टों में भी इसे सेना में शामिल किए जाने की दिशा में आगे बढ़ती प्रणाली बताया गया था।
यानी भारत के सामने एक परिचित रक्षा खरीद की स्थिति है—
अपनी तकनीक विकसित हो रही है, लेकिन सेना को इंतजार नहीं करना है।
यहीं विदेशी खरीद का रास्ता खुलता है।
जैवलिन: तैयार क्षमता बनाम विकसित होती क्षमता
जैवलिन कोई प्रयोगात्मक प्रणाली नहीं है। यह अमेरिकी सेना और उसके सहयोगियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली स्थापित एंटी-टैंक प्रणाली है और इसे युद्ध-अनुभव वाली प्रणाली के रूप में पेश किया जाता है।
नवंबर 2025 में अमेरिकी रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी (DSCA) ने भारत के लिए 100 FGM-148 जैवलिन राउंड, एक फ्लाई-टू-बाय मिसाइल और 25 कमांड लॉन्च यूनिट की संभावित बिक्री को मंजूरी दी थी। उस प्रस्ताव की अनुमानित कीमत करीब 45.7 करोड़ डॉलर बताई गई थी।
इसलिए वर्तमान खरीद को केवल “भारत ने विदेशी मिसाइल खरीदी” के रूप में देखना अधूरा होगा।
यह तत्काल उपलब्ध क्षमता और दीर्घकालीन स्वदेशी क्षमता के बीच पुल भी हो सकती है।
क्या यह आत्मनिर्भर भारत की कमजोरी है?
जरूरी नहीं।
बल्कि इसे आत्मनिर्भरता की व्यावहारिक परीक्षा के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
किसी हथियार को डिजाइन कर लेना और उसे बड़ी संख्या में सेना को समय पर उपलब्ध करा देना दो अलग चरण हैं। रक्षा प्रणालियों में परीक्षण, प्रमाणन, उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता नियंत्रण, आपूर्ति श्रृंखला और सेना की जरूरत के अनुरूप बड़े पैमाने पर तैनाती—सभी समय लेते हैं।
भारत ने हाल के वर्षों में मिसाइल तकनीक में अपनी क्षमता तेजी से बढ़ाई है। अगस्त 2026 में रक्षा मंत्रालय ने DRDO द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय रक्षा कंपनियों को हस्तांतरित करने की दिशा में भी कदम उठाया है।
यानी तस्वीर यह नहीं है कि भारत आयात से आत्मनिर्भरता की ओर जा रहा है।
तस्वीर यह है कि भारत एक साथ स्वदेशी उत्पादन बढ़ा रहा है और तत्काल जरूरतों के लिए विदेशी प्रणालियां भी खरीद रहा है।
हथियार बाजार में “ब्रिज मॉडल”
जैवलिन सौदे को भारत के रक्षा बाजार के एक संभावित ब्रिज मॉडल के रूप में देखा जा सकता है।
एक तरफ सेना को तत्काल जरूरत की प्रणाली मिलती है।
दूसरी तरफ स्वदेशी MPATGM का विकास और उत्पादन आगे बढ़ता है।
और तीसरी तरफ भारत-अमेरिका के बीच संभावित सह-उत्पादन की चर्चा शुरू होती है।
अमेरिकी दूतावास ने भी मौजूदा LOA को भारत में जैवलिन के सह-उत्पादन का अंतिम समझौता नहीं बताया है। उसका बयान भविष्य में co-production और अन्य औद्योगिक अवसरों पर बातचीत का रास्ता खुलने की बात करता है।
यानी अभी इसे “भारत में जैवलिन बनेगी” कहना जल्दबाजी होगी।
लेकिन भारतीय रक्षा उद्योग में जैवलिन की संभावित अगली भूमिका सिर्फ आयात तक सीमित रह सकती है, यह भी अभी तय नहीं है।
अमेरिका को क्या मिलेगा?
इस सौदे को केवल भारतीय जरूरत के नजरिए से देखना भी सही नहीं होगा।
भारत दुनिया के बड़े रक्षा बाजारों में से एक है। अमेरिकी रक्षा कंपनियों के लिए भारतीय सेना की जरूरतें केवल एक बार की बिक्री का अवसर नहीं, बल्कि लंबे समय के औद्योगिक सहयोग का बाजार हैं।
जैवलिन प्रणाली से जुड़ी प्रमुख अमेरिकी कंपनियों में RTX और Lockheed Martin का संयुक्त उद्यम शामिल है।
यदि भविष्य में भारत में सह-उत्पादन की व्यवस्था बनती है तो अमेरिका को भारतीय उत्पादन क्षमता और बड़े बाजार तक पहुंच मिलेगी, जबकि भारत को स्थानीय विनिर्माण, आपूर्ति श्रृंखला और औद्योगिक सहयोग का लाभ मिल सकता है।
यहीं सौदा हथियार खरीद से रक्षा औद्योगिक साझेदारी की तरफ बढ़ता है।
भारत के लिए असली कसौटी
इस सौदे की सफलता का आकलन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि सेना को कितनी जैवलिन मिलीं।
बड़ी कसौटी यह होगी कि—
क्या जैवलिन तत्काल जरूरत पूरी करती है?
क्या MPATGM समय पर और पर्याप्त संख्या में सेना तक पहुंचती है?
क्या भारतीय कंपनियां स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल का उत्पादन बड़े पैमाने पर कर पाती हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या विदेशी खरीद भविष्य में भारतीय रक्षा उत्पादन की जगह लेती है या उसे गति देती है?
यही अंतर “आत्मनिर्भरता” और सिर्फ “आयात घटाने” के बीच है।
असली कहानी जैवलिन नहीं, समय है
भारत के हथियार बाजार में अब सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि हथियार विदेशी है या स्वदेशी।
सवाल यह है कि—
सेना को क्षमता कब चाहिए?
देश उसे खुद कब बना सकता है?
और विदेशी तकनीक को भारतीय उत्पादन क्षमता में कब बदला जा सकता है?
जैवलिन सौदा इसी बदलती सोच का उदाहरण हो सकता है।
भारत एक ओर स्वदेशी MPATGM को आगे बढ़ा रहा है और दूसरी ओर तत्काल जरूरत के लिए जैवलिन खरीद रहा है। अगर आगे चलकर सह-उत्पादन और भारतीय औद्योगिक भागीदारी भी जुड़ती है, तो यह सौदा आयात से आत्मनिर्भरता की ओर संक्रमण का हिस्सा बन सकता है।
इसलिए जैवलिन की कहानी को केवल “अमेरिका से मिसाइल खरीदी” के रूप में देखना शायद गलत होगा।
असल कहानी यह है कि भारत अपने हथियार बाजार में तत्काल सैन्य क्षमता, स्वदेशी तकनीक और वैश्विक रक्षा उद्योग—इन तीनों को एक साथ कैसे साध रहा है।
