नई दिल्ली, 18 अगस्त। वाय के न्यूज। छात्र प्रदर्शनकारियों पर कथित पुलिस ज्यादती के आरोपों को दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में खारिज कर दिया है। पुलिस ने जवाबी हलफनामे में कहा है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च की अनुमति नहीं थी और बैरिकेड की कई परतें तोड़कर आगे बढ़ने के बाद स्थिति हिंसक हुई। इसके बाद भीड़ को नियंत्रित करने के लिए चरणबद्ध तरीके से बल का इस्तेमाल किया गया।
दिल्ली पुलिस के अनुसार प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर और आसपास के करीब तीन किलोमीटर क्षेत्र में 30 हजार से अधिक प्रदर्शनकारी मौजूद थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगभग 5 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। पुलिस का दावा है कि झड़प में 240 से अधिक पुलिसकर्मी और वर्दीधारी अधिकारी तथा करीब 200 आम लोग और प्रदर्शनकारी घायल हुए।
संसद मार्च की अनुमति नहीं थी
पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संसद की ओर मार्च के लिए कोई अनुमति नहीं दी गई थी। इसलिए बैरिकेड पार कर संसद की ओर बढ़ने का प्रयास पुलिस के अनुसार गैरकानूनी सभा की ओर से किया गया गैरकानूनी कृत्य था। पुलिस ने कहा कि प्रदर्शन शुरू में शांतिपूर्ण था, लेकिन भीड़ के एक हिस्से ने बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने और हिंसा करने की कोशिश की।
तस्वीरों और वीडियो को बताया चुनिंदा
पुलिस ने याचिकाओं में इस्तेमाल की गई तस्वीरों और वीडियो की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया है। हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाओं में चुनिंदा तस्वीरों, अधूरे वीडियो तथा अपुष्ट समाचार और सोशल मीडिया सामग्री पर भरोसा किया गया है। पुलिस के मुताबिक इससे घटनाक्रम का एकतरफा चित्र सामने आता है और कार्रवाई का पूरा संदर्भ स्पष्ट नहीं होता।
कीलों वाली लाठी के आरोप से इनकार
प्रदर्शनकारियों की ओर से लगाए गए कीलों वाली लाठियों के इस्तेमाल के आरोप पर पुलिस ने कहा कि उपलब्ध वीडियो में ऐसी वस्तु दिखाई देती है, लेकिन वह पुलिसकर्मी के हाथ में नहीं थी। पुलिस के अनुसार वह राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ डंडा था। पुलिस ने कहा कि भीड़ नियंत्रण के लिए लाठी का इस्तेमाल निर्धारित और अनुमत उपायों में शामिल है।
सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी पर सफाई
सादे कपड़ों में लाठी लिए पुलिसकर्मियों की मौजूदगी पर भी दिल्ली पुलिस ने कहा कि विशेष शाखा, विशेष प्रकोष्ठ, अपराध शाखा और स्थानीय पुलिस के कुछ अधिकारियों को स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भीड़ के बीच तैनात किया गया था। पुलिस ने इसे सामान्य और कानूनी व्यवस्था बताया तथा कहा कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे बड़े आयोजनों में भी ऐसी तैनाती की जाती है।
करीब 2,873 लोगों पर पहले से मामले
दिल्ली पुलिस ने हलफनामे में दावा किया है कि प्रदर्शन में शामिल करीब 2,873 लोगों के खिलाफ पहले से आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, दुष्कर्म और पॉक्सो कानून से जुड़े मामले भी शामिल बताए गए हैं। पुलिस के अनुसार इन लोगों की प्रदर्शन में भूमिका की जांच पुलिस आयुक्त द्वारा गठित विशेष जांच दल करेगा।
चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल का बचाव
प्रदर्शन स्थल पर चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल पर पुलिस ने कहा कि यह स्थिति के अनुरूप और संतुलित पुलिसिंग का उपाय था। पुलिस का दावा है कि इससे प्रदर्शन स्थल पर मौजूद हर व्यक्ति की पहचान अपने आप दर्ज नहीं होती और इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की अंधाधुंध निगरानी के लिए नहीं किया गया।
पुलिस ने कहा कि केवल चेहरे की पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती। पहचान की पुष्टि के लिए अलग से जांच की जाती है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद था या नहीं।
अदालत की प्रस्तावित समिति से जांच पर सहयोग
दिल्ली पुलिस ने कहा है कि बल प्रयोग के आरोपों की जांच के लिए यदि सुप्रीम कोर्ट कोई समिति गठित करता है तो वह उसके साथ पूरा सहयोग करेगी। पुलिस का जवाब उन याचिकाओं के सिलसिले में दाखिल किया गया है, जिनमें प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती की अदालत की निगरानी में जांच की मांग की गई है।
