कर्नाटक के 56% आरक्षण कानून पर ब्रेक

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कोर्ट में मामला लंबित, केंद्र ने फैसला टाला

कांग्रेस सरकार के अनुरोध पर नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव फिलहाल आगे नहीं बढ़ेगा

नई दिल्ली, 25 जुलाई 2026, वाय के न्यूज। केंद्र सरकार ने कर्नाटक की 56 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था से जुड़े कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव फिलहाल टाल दिया है। सरकार का कहना है कि यह कानून कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती के दायरे में है। इसलिए अदालत में सुनवाई पूरी होने तक इस पर कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने केंद्र से कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022 को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध किया था। यह कानून राज्य में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए कुल 56 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है।

हालांकि, इस कानून को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है और मामला अभी विचाराधीन है। इसी आधार पर केंद्र सरकार ने प्रस्ताव पर आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

इस फैसले के राजनीतिक मायने भी हैं। कर्नाटक में आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से चुनावी राजनीति के केंद्र में रहा है। कांग्रेस सरकार ने इसे सामाजिक न्याय के अपने प्रमुख एजेंडे के रूप में आगे बढ़ाया है और कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग भी उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने कानून के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना केवल यह कहा है कि मामला न्यायालय में लंबित होने के कारण फिलहाल कोई फैसला लेना उचित नहीं होगा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आरक्षण से जुड़े इस मुद्दे पर आगे भी कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी जारी रह सकती है, क्योंकि कर्नाटक में एससी, एसटी और ओबीसी मतदाता चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

क्या है नौवीं अनुसूची?

संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को विशेष कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के बाद अब नौवीं अनुसूची में शामिल कानून भी संविधान के मूल ढांचे की कसौटी पर न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं।

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