चंडीगढ़, 22 जुलाई 2026 (वाय के न्यूज डेस्क )। भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ एलोपैथी पर आधारित होगी या आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां भी इसमें अहम भूमिका निभाएंगी? इसी सवाल पर भारत ने BRICS-2026 की अध्यक्षता के तहत चंडीगढ़ में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (TCIM) पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। नौ सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर आधुनिक और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को साथ लेकर लोगों को अधिक सुलभ, किफायती और समग्र स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और आयुष मंत्रालय की ओर से आयोजित यह सम्मेलन BRICS स्वास्थ्य कार्यक्रम के चार दिवसीय आयोजन का हिस्सा था। इसमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात के वरिष्ठ अधिकारी, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नीति-निर्माता शामिल हुए।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, शोध और वैज्ञानिक प्रमाणों को साझा करना, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करना और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए साझा रणनीति तैयार करना था। भारत ने सम्मेलन में कहा कि आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी जैसी प्रणालियों को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर उसका पूरक बनाकर देखा जाना चाहिए।
BRICS अध्यक्षता की थीम “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण” के अनुरूप सम्मेलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने के लिए वैज्ञानिक शोध, क्लीनिकल परीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और नियामकीय मानकों को मजबूत करना जरूरी है।
भारत लंबे समय से आयुष प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में काम कर रहा है। कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया भर में रोगों के इलाज के साथ-साथ निवारक स्वास्थ्य, जीवनशैली सुधार और समग्र चिकित्सा के प्रति रुचि बढ़ी है। ऐसे में BRICS जैसे प्रभावशाली समूह में इस विषय पर सहमति बनना भारत के लिए कूटनीतिक और स्वास्थ्य—दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देशों के बीच इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ता है तो पारंपरिक चिकित्सा पर संयुक्त शोध, औषधियों के गुणवत्ता मानक, चिकित्सकों का प्रशिक्षण और रोगियों के लिए सुरक्षित एवं प्रमाण-आधारित उपचार विकल्प विकसित करने में मदद मिलेगी।
आम लोगों के लिए इसका क्या मतलब है?
- इलाज में केवल एलोपैथी ही नहीं, बल्कि जरूरत और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी जैसी पद्धतियों का भी बेहतर समन्वय हो सकेगा।
- पारंपरिक चिकित्सा पर संयुक्त शोध बढ़ने से इनके प्रभाव और सुरक्षा संबंधी बेहतर वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध होंगे।
- दवाओं की गुणवत्ता और मानकीकरण में सुधार होगा।
- सदस्य देशों के बीच विशेषज्ञों और शोध संस्थानों का सहयोग बढ़ेगा।
- भविष्य में समग्र (Holistic) और किफायती स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा विस्तृत हो सकता है।
बॉक्स | BRICS देशों में कौन-सी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां प्रचलित हैं?
| देश | प्रमुख पारंपरिक चिकित्सा पद्धति |
|---|---|
| भारत | आयुर्वेद, योग, सिद्ध, यूनानी, सोवा-रिग्पा; होम्योपैथी का भी व्यापक संस्थागत उपयोग |
| चीन | ट्रेडिशनल चाइनीज़ मेडिसिन (TCM), एक्यूपंक्चर, हर्बल चिकित्सा |
| ब्राजील | आदिवासी (इंडिजिनस) चिकित्सा परंपराएं, औषधीय पौधों पर आधारित उपचार |
| रूस | हर्बल चिकित्सा, बाल्नियोथेरेपी (खनिज जल चिकित्सा), लोक चिकित्सा |
| दक्षिण अफ्रीका | अफ्रीकी पारंपरिक चिकित्सा और हर्बल उपचार |
| मिस्र | हर्बल चिकित्सा, यूनानी (ग्रीको-अरबी) चिकित्सा का प्रभाव |
| ईरान | पर्शियन (ईरानी) पारंपरिक चिकित्सा, यूनानी परंपरा से प्रभावित चिकित्सा |
| इथियोपिया | स्थानीय हर्बल और पारंपरिक उपचार पद्धतियां |
| संयुक्त अरब अमीरात | अरबी एवं इस्लामी पारंपरिक चिकित्सा, हिजामा (कपिंग), हर्बल उपचार |
क्या आप जानते हैं?
- एलोपैथी शब्द आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine) के लिए आम बोलचाल में इस्तेमाल होता है।
- आयुर्वेद की उत्पत्ति भारत में हुई और इसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है।
- यूनानी चिकित्सा की जड़ें प्राचीन यूनान में हैं, लेकिन भारत, ईरान और अरब देशों में इसका व्यापक विकास हुआ।
- होम्योपैथी का जन्म जर्मनी में हुआ, लेकिन आज भारत इसके सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में शामिल है।
- चीन की पारंपरिक चिकित्सा (TCM) और भारत की आयुष प्रणालियां दुनिया की सबसे व्यवस्थित पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में गिनी जाती हैं।
