मुजफ्फरनगर, 8 सितंबर, वाय के न्यूज़। मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने एक मामले में दिए 38 पन्नों के फैसले में उत्तर प्रदेश की अपराध नियंत्रण नीति और न्याय व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। उन्होंने राज्य सरकार की उस दलील से सहमति जताई कि अपराधियों के खिलाफ एनकाउंटर, उनकी संपत्ति जब्त करने और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत जैसी सख्त कार्रवाइयों से मुजफ्फरनगर में अपराध कम हुए। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी सख्ती कानून के शासन का विकल्प नहीं हो सकती।
यह टिप्पणी नादिम नामक आरोपी को उसकी पत्नी शाहजादी पर मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जलाने के मामले में मौत की सजा सुनाते हुए की गई। अदालत ने अपराध को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी का माना। फैसले में सरकारी पक्ष की ओर से मुजफ्फरनगर के पुराने आपराधिक माहौल और सरकार की कठोर नीति का उल्लेख किया गया था, जिसे जज ने सही माना।
कभी ‘क्राइम कैपिटल’ कहा जाता था मुजफ्फरनगर
जज ने फैसले में मुजफ्फरनगर के पुराने आपराधिक माहौल का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिले को कभी संगठित अपराध, गैंगवार, अपहरण, फिरौती के लिए हत्या, अवैध हथियारों की तस्करी और सुपारी लेकर हत्या जैसी घटनाओं के कारण उत्तर प्रदेश की ‘क्राइम कैपिटल’ के रूप में देखा जाता था।
फैसले में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई सक्रिय आपराधिक गिरोहों के प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा गया कि गन्ने के कारोबार, ठेकों और जमीन के विवादों से जुड़े आर्थिक हित भी हिंसक संघर्षों का कारण बनते रहे। अपराध और राजनीतिक संरक्षण के रिश्ते की चर्चा भी फैसले में की गई है।
कोर्ट परिसर में गैंगस्टर विक्की त्यागी की हत्या का जिक्र
जज ने 16 फरवरी 2015 को मुजफ्फरनगर जिला अदालत परिसर में गैंगस्टर विक्की त्यागी की हत्या का भी उल्लेख किया। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त जिला जज की अदालत में मौजूद विक्की त्यागी पर गोलियां चलाई गई थीं और हमलावर के वकील के वेश में होने का उल्लेख फैसले में किया गया।
जज के अनुसार यह घटना उस समय के आपराधिक आतंक को दर्शाती थी, जब अपराधियों में कानून और अदालत का भय तक खत्म हो गया था।
शौकीन गैंग और ‘चंबल के बीहड़ों’ जैसा आतंक
फैसले में शौकीन गैंग के प्रभाव का भी उल्लेख है। जज ने लिखा कि गंगा खादर क्षेत्र में इस गैंग का ऐसा आतंक था, जिसकी तुलना चंबल के बीहड़ों से की जाती थी। अपहरण कर फिरौती मांगना और रकम नहीं मिलने पर हत्या करना इस गिरोह की कार्यप्रणाली से जोड़ा गया।
जज ने बताया कि शौकीन और उसके शूटर एहसान को करीब 22-23 साल पहले पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया था। वहीं शौकीन के भाई शाहनवाज को इसी अदालत ने 12 अगस्त 2026 को व्यापारी सलीम के अपहरण और फिरौती के लिए हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई थी।
पीड़ितों के अधिकार पर जज का सवाल
फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पीड़ितों के अधिकार से जुड़ा है। जज ने हाल में शामली में हुई हरियाणवी गायक अंकित बालियान की हत्या का संदर्भ देते हुए सवाल उठाया कि क्या आपराधिक न्याय व्यवस्था को केवल आरोपी के अधिकारों और हितों की चिंता करनी चाहिए?
उन्होंने सवाल उठाया कि बालियान के माता-पिता, पत्नी और परिवार, जो पीड़ित हैं, उनके अधिकार और हितों पर भी विचार नहीं किया जाना चाहिए? जज ने यह भी सवाल उठाया कि गंभीर मामलों में क्या आरोपी प्रभावी रूप से यह तय करने का अधिकार रख सकता है कि उसका मुकदमा किस अदालत में चले।
गैंगस्टरों का डर मुकदमों में देरी कराता है
जज ने कहा कि माफिया और गैंगस्टरों का भय आपराधिक मुकदमों की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने चित्रकूट के ठोकिया गैंग मामले में अपने फैसले का उल्लेख किया, जहां अभियोजन के दो गवाहों की गवाही के बीच करीब 11 साल का अंतर रहा।
उनके अनुसार यह उदाहरण बताता है कि माफिया और गैंगस्टरों का आतंक सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों में भय पैदा कर सकता है और मुकदमों में देरी हो सकती है। उन्होंने मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी के मुकदमे और 2010 के बरेली दंगों से जुड़े मौलाना तौकीर रजा के मामलों का भी उल्लेख किया।
‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की स्थिति से चेताया
जज ने कहा कि जब समाज में अपराधियों का प्रभाव बढ़ जाता है तो ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। उन्होंने न्यायाधीशों को भी अपराधियों के लिए ‘सॉफ्ट टारगेट’ बताया। उनके अनुसार न्यायिक व्यवस्था में भय का असर पड़ने पर सबसे ज्यादा नुकसान कमजोर और गरीब व्यक्ति को होता है।
उन्होंने कहा कि कमजोर व्यक्ति के लिए कानून का शासन ही सबसे बड़ा सहारा है, जबकि अराजकता से शक्तिशाली लोगों को फायदा होता है।
‘आज दुनिया को दान से ज्यादा न्याय की जरूरत’
फैसले में जज ने लिखा कि “आज दुनिया में दान की बजाय न्याय की ज्यादा जरूरत है। न्याय की गैर हाजिरी में स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता।”
यह टिप्पणी फैसले में कानून के शासन और न्याय की भूमिका पर उनके व्यापक विचार का हिस्सा है।
अपनी सुरक्षा और धमकियों का भी किया जिक्र
फैसले में जज ने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के बाद कथित तौर पर मिली धमकियों और विदेशी नंबरों से आए फोन का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बावजूद स्थानीय पुलिस ने उनकी सुरक्षा को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई और उनकी सुरक्षा पहले की तुलना में कम की गई।
जज ने धनबाद के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश उत्तम आनंद की हत्या सहित न्यायिक अधिकारियों पर हुए हमलों का भी संदर्भ दिया और कहा कि गंभीर मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश असामाजिक तत्वों के निशाने पर हो सकते हैं।
‘कायर जज कहलाने से बेहतर मरना पसंद करूंगा’
फैसले में जज ने अपनी न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर भी बेहद कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि वह बाहुबली, माफिया या अपराधियों से डरने लगें तो यह जनता की उनसे अपेक्षा के विपरीत होगा।
उन्होंने कहा कि वह “कायर जज” कहलाने की बजाय मरना पसंद करेंगे और जब तक अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं, न्यायिक सेवा में बने रहेंगे; अन्यथा इस्तीफा देना पसंद करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक कुर्सी पर रहते हुए निर्णय लेने का अधिकार उन्हीं का होगा।
अदालत से गंभीर मामलों की फाइलें हटाए जाने पर भी टिप्पणी
जज ने यह भी कहा कि गंभीर मामलों को उनकी अदालत से वापस लेकर दूसरे न्यायालय में भेजे जाने की घटनाओं से वह ‘गहराई से आहत और दुखी’ हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इससे माफिया और अपराधियों को लाभ मिल सकता है।
हालांकि यह टिप्पणी उस व्यापक विवाद की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है जिसमें अगस्त 2026 में उनकी अदालत से हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े 97 लंबित मामलों की फाइलें वापस लिए जाने की खबर सामने आई थी।
सख्ती के साथ कानून का शासन जरूरी
जज दिवाकर ने एक ओर उत्तर प्रदेश की सख्त अपराध नियंत्रण नीति के प्रभाव को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर यह स्पष्ट किया कि एनकाउंटर, संपत्ति जब्ती या NSA जैसी कार्रवाई कानून के शासन का स्थान नहीं ले सकती।
फैसले का मूल संदेश यही है कि अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ न्यायिक प्रक्रिया, पीड़ितों के अधिकार और कानून के शासन की रक्षा भी समान रूप से जरूरी है।
