पद्मविभूषण तीजनबाई, हास्य कलाकार रामू यादव और शिक्षाविद राजेन्द्र सिंह ठाकुर को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि
साकेत साहित्य परिषद का आयोजन
राजनांदगांव 24 जुलाई 2026 /छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के ग्राम सुरगी में संचालित साकेत साहित्य परिषद द्वारा मासिक साहित्यिक परिचर्चा और काव्य -गोष्ठी का आयोजन किया गया । प्रथम सत्र में साहित्यिक परिचर्चा हुई, जिसमें छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध पंडवानी कलाकार, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई, आंचलिक लोक नाटकों के हास्य कलाकार राजनांदगांव निवासी रामू यादव तथा वरिष्ठ शिक्षाविद और शिवनाथ साहित्यधारा (डोंगरगाँव) के संरक्षक राजेन्द्र सिंह ठाकुर को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई । इस अवसर पर साहित्यकारों और कलाकारों ने प्रदेश की कला -संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में तीनों विभूतियों के महत्वपूर्ण योगदान को याद किया । दूसरे सत्र में साकेत साहित्य परिषद के 27वें वार्षिक सम्मान समारोह के आयोजन की तैयारी पर विचार किया गया । तीसरे और समापन सत्र में काव्य गोष्ठी हुई ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, राजनांदगांव जिला समन्वयक आत्माराम कोशा ‘अमात्य’ थे। प्रथम सत्र की अध्यक्षता साकेत साहित्य परिषद, सुरगी के अध्यक्ष ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’ ने और दूसरे सत्र की अध्यक्षता अखिलेश्वर प्रसाद मिश्रा ‘अकाट्य’ प्रदेश अध्यक्ष समरस साहित्य सृजन संस्थान छत्तीसगढ़ ने की । विशेष अतिथि के रूप में लखनलाल कलामे जिला पंचायत सदस्य मोहला, गायत्री साहू ‘शिवांगी’ और हर्षा देवांगन (बालोद) डॉ. इकबाल खान ‘तन्हा’ (मोहला) प्रभात तिवारी ( राजनांदगांव) जितेन्द्र पटेल ‘विद्रोही’ (मोहला ) उपस्थित थे ।
विगत रविवार 19 जुलाई को आयोजित कार्यक्रम के प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार कुबेर सिंह साहू ने कहा कि स्वर्गीय डॉ.तीजनबाई ने छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित किया और प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की।श्री साहू ने कहा कि तीजनबाई का सम्पूर्ण जीवन संघर्ष, साधना और लोकसंस्कृति के प्रति उनके समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि लोककलाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए नई पीढ़ी को प्रेरित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने तीजनबाई की पंडवानी कला – साधना की तुलना मीराबाई की भक्ति से करते हुए कहा कि उनकी कला लोकजीवन की आत्मा का सशक्त स्वर थी। विशिष्ट वक्ता महेन्द्र कुमार बघेल ‘मधु’ ने कहा कि तीजनबाई ने अपनी विलक्षण प्रस्तुति शैली, प्रभावशाली वाणी और सशक्त अभिनय के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकपरंपरा को जन-जन तक पहुँचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
मुख्य अतिथि आत्माराम कोशा ‘अमात्य’ ने कहा कि पद्मविभूषण स्व. तीजनबाई केवल छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे भारत की लोकसांस्कृतिक चेतना की सशक्त प्रतिनिधि थीं। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला किसी क्षेत्र विशेष की सीमाओं में बंधी नहीं होती, बल्कि वह सम्पूर्ण मानवता की साझा सांस्कृतिक धरोहर होती है।अध्यक्षीय भाषण में ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’ ने कहा कि नई पीढ़ी के कलाकारों को तीजनबाई के संघर्ष, उनकी कला -साधना और लोकसंस्कृति के प्रति उनके समर्पण से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
रोशनलाल साहू (शिक्षक) ने कहा कि तीजनबाई ने अपनी अद्वितीय कला-साधना, ओजस्वी प्रस्तुति और लोकपरंपराओं के संरक्षण के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया।
मदन मंडावी ने अपने आधार वक्तव्य में कहा कि पद्मविभूषण स्व. तीजनबाई केवल एक महान लोक कलाकार ही नहीं थीं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की सशक्त प्रतीक थीं। परिचर्चा सत्र का संचालन करते हुए लखनलाल साहू ‘लहर’ ने कहा कि पद्मविभूषण स्व. तीजनबाई का संघर्ष, उनकी कला-साधना तथा लोकसंस्कृति के प्रति उनका आजीवन समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा । वक्ताओं ने अंचल के सुप्रसिद्ध हास्य कलाकार रामू यादव और शिक्षविद,( सेवानिवृत्त व्याख्याता )राजेन्द्र सिंह ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी प्रकाश डाला ।
दूसरे सत्र में साकेत साहित्य परिषद के 27वें वार्षिक सम्मान समारोह की रूपरेखा, आयोजन संबंधी तैयारियों तथा विभिन्न व्यवस्थाओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई। तीसरे सत्र में काव्य -गोष्ठी हुई, जिसका संचालन संयुक्त रूप से वीरेंद्र तिवारी ‘वीरू और पवन यादव ‘पहुना’ ने किया। काव्य -गोष्ठी में प्यारेलाल देशमुख, दिलीप साहू ‘अमृत’ , आनंद सार्वा, जसवंत मंडावी, कैलाश साहू ‘कुंवारा’, डोहरदास साहू, कुलेश्वर दास साहू, अमृत दास साहू, देवजोशी ‘गुलाब’ , माला गौतम, पप्पू कलिहारी , चंचल साहू, आकाश साहू , राजेन्द्र देवांगन सहित अतिथियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया ।अंत में कुलेश्वरदास साहू ने आभार व्यक्त किया।
