महानदी: पानी, राजनीति और पड़ोसी राज्यों का दशक पुराना विवाद

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बदलती सरकारों के बीच बदला संवाद का स्वर, लेकिन अंतिम फैसला अब भी बाकी



रायपुर/भुवनेश्वर, 31 जुलाई 2026, वाय के न्यूज। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच महानदी जल विवाद एक दशक से अधिक समय से देश के सबसे चर्चित अंतरराज्यीय नदी विवादों में शामिल है। यह केवल पानी के बंटवारे का मामला नहीं, बल्कि सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक विकास, पर्यावरण और संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न भी है। पिछले दस वर्षों में इस विवाद ने अदालत, न्यायाधिकरण और राजनीतिक मंच—तीनों जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अब, दोनों राज्यों में भाजपा सरकार होने के बाद पहली बार समाधान की उम्मीद पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।


विवाद की शुरुआत कैसे हुई?


महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा क्षेत्र से होता है। लगभग 851 किलोमीटर लंबी यह नदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा से होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। नदी के जलग्रहण क्षेत्र का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा छत्तीसगढ़ और शेष लगभग 46 प्रतिशत ओडिशा में है।
विवाद तब गहराया जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ ने महानदी और उसकी सहायक नदियों पर कई बैराज, एनीकट और जल संरचनाएं बनाकर गैर-मानसूनी मौसम में नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित किया है। ओडिशा का कहना था कि इससे हीराकुंड बांध में पानी कम पहुंचता है, जिससे सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन और महानदी डेल्टा के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ता है।
दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ लगातार यह कहता रहा कि वह अपने क्षेत्र में उपलब्ध जल का वैध उपयोग कर रहा है। राज्य का तर्क है कि विकास, सिंचाई और पेयजल परियोजनाओं के लिए जल का उपयोग उसका अधिकार है और अंतिम जल बंटवारे का निर्णय न्यायाधिकरण करेगा।


अदालत से न्यायाधिकरण तक


2016 में ओडिशा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद केंद्र सरकार ने मार्च 2018 में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। न्यायाधिकरण दोनों राज्यों के दावों, जल उपलब्धता, उपयोग और वैज्ञानिक आंकड़ों का परीक्षण कर रहा है। अभी तक अंतिम निर्णय नहीं आया है


बदलती राजनीति, बदलता माहौल


महानदी विवाद का राजनीतिक पक्ष भी कम दिलचस्प नहीं रहा।
2016–2018: छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह (भाजपा) और ओडिशा में नवीन पटनायक (बीजद) की सरकारें थीं। दोनों राज्यों के बीच बयानबाजी तेज रही।
2018–2023: छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार आई, जबकि ओडिशा में नवीन पटनायक ही मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान विवाद न्यायाधिकरण और कानूनी प्रक्रिया तक सीमित रहा, हालांकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी रहे।
2024 के बाद: ओडिशा में भाजपा सरकार बनने के साथ ही मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने विवाद को टकराव के बजाय बातचीत से सुलझाने की इच्छा जताई। केंद्र में भी भाजपा सरकार होने से संवाद का नया दौर शुरू हुआ।
हाल के महीनों में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की पहल पर दोनों राज्यों के बीच उच्च स्तरीय बैठकें हुईं, जिनमें वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर समाधान तलाशने और न्यायाधिकरण की प्रक्रिया में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है।


समाधान की राह आसान नहीं


विशेषज्ञों का मानना है कि विवाद केवल पानी की मात्रा का नहीं है। इसमें मानसूनी और गैर-मानसूनी प्रवाह, भविष्य की सिंचाई योजनाएं, औद्योगिक उपयोग, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय आवश्यकताओं को भी संतुलित करना होगा।
अंतिम समाधान या तो दोनों राज्यों की आपसी सहमति से निकलेगा या फिर महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम निर्णय से।


टाइमलाइन


2016: ओडिशा ने छत्तीसगढ़ के निर्माण कार्यों पर आपत्ति जताई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
2018: केंद्र सरकार ने महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया।
2018–2023: न्यायाधिकरण के समक्ष दोनों राज्यों ने अपने-अपने दावे और तकनीकी आंकड़े प्रस्तुत किए।
2024: ओडिशा में सत्ता परिवर्तन के बाद दोनों राज्यों के बीच संवाद का नया दौर शुरू हुआ।
2025–2026: केंद्र की मध्यस्थता में कई दौर की बैठकें हुईं; न्यायाधिकरण की कार्यवाही जारी है, लेकिन अंतिम फैसला अभी शेष है।


तथ्य बॉक्स


नदी की लंबाई: लगभग 851 किमी
उद्गम: सिहावा, धमतरी (छत्तीसगढ़)
मुख्य बांध: हीराकुंड (ओडिशा)
विवाद का मुख्य मुद्दा: ऊपरी प्रवाह में जल संरचनाएं, गैर-मानसूनी जल प्रवाह और जल उपयोग
न्यायाधिकरण गठन: मार्च 2018
वर्तमान स्थिति: अंतिम निर्णय लंबित, बातचीत और न्यायाधिकरण—दोनों प्रक्रियाएं समानांतर जारी।


ओड़िया अनुवाद

ମହାନଦୀ: ପାଣି, ରାଜନୀତି ଓ ପଡ଼ୋଶୀ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦଶକ ପୁରୁଣା ବିବାଦ

ସରକାର ବଦଳିବା ସହ ସଂଳାପର ସ୍ୱର ବଦଳିଛି, କିନ୍ତୁ ଅନ୍ତିମ ନିଷ୍ପତ୍ତି ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବାକି

ରାୟପୁର/ଭୁବନେଶ୍ୱର, ୩୧ ଜୁଲାଇ ୨୦୨୬, ୱାଇ କେ ନ୍ୟୁଜ୍।

ଛତିଶଗଡ଼ ଓ ଓଡ଼ିଶା ମଧ୍ୟରେ ମହାନଦୀ ଜଳ ବିବାଦ ଗତ ଦଶକରୁ ଅଧିକ ସମୟ ଧରି ଦେଶର ସବୁଠାରୁ ଚର୍ଚ୍ଚିତ ଆନ୍ତର୍ରାଜ୍ୟ ନଦୀ ବିବାଦମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଗୋଟିଏ। ଏହା କେବଳ ପାଣି ବଣ୍ଟନର ପ୍ରଶ୍ନ ନୁହେଁ, ବରଂ ସେଚନ, ପାନୀୟ ଜଳ, ଶିଳ୍ପ ବିକାଶ, ପରିବେଶ ଓ ସଂଘୀୟ ବ୍ୟବସ୍ଥାରେ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କ ଅଧିକାର ସହ ଜଡ଼ିତ ଏକ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ପ୍ରସଙ୍ଗ। ଗତ ଦଶ ବର୍ଷ ଧରି ଏହି ବିବାଦ ଅଦାଲତ, ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ଏବଂ ରାଜନୈତିକ ମଞ୍ଚ—ତିନୋଟି ସ୍ତରରେ ଚର୍ଚ୍ଚାର ବିଷୟ ହୋଇ ରହିଛି। ବର୍ତ୍ତମାନ ଉଭୟ ରାଜ୍ୟରେ ଭାରତୀୟ ଜନତା ପାର୍ଟିର ସରକାର ଥିବାରୁ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଏହାର ସମାଧାନ ନେଇ ଆଶା ଅଧିକ ସୁଦୃଢ଼ ହୋଇଛି।

ବିବାଦର ଆରମ୍ଭ କିପରି ହେଲା?

ମହାନଦୀର ଉତ୍ସ ଛତିଶଗଡ଼ର ଧମତରୀ ଜିଲ୍ଲାର ସିହାୱା ଅଞ୍ଚଳରେ ଅବସ୍ଥିତ। ପ୍ରାୟ ୮୫୧ କିଲୋମିଟର ଲମ୍ବା ଏହି ନଦୀ ଛତିଶଗଡ଼ ଓ ଓଡ଼ିଶା ଦେଇ ପ୍ରବାହିତ ହୋଇ ବଙ୍ଗୋପସାଗରରେ ମିଶିଯାଏ। ନଦୀର ଜଳଗ୍ରହଣ କ୍ଷେତ୍ରର ପ୍ରାୟ ୫୪ ଶତାଂଶ ଛତିଶଗଡ଼ରେ ଏବଂ ଶେଷ ୪୬ ଶତାଂଶ ଓଡ଼ିଶାରେ ଅବସ୍ଥିତ।

ବିବାଦ ସେତେବେଳେ ଗଭୀର ହେଲା, ଯେତେବେଳେ ଓଡ଼ିଶା ଅଭିଯୋଗ କଲା ଯେ ଛତିଶଗଡ଼ ମହାନଦୀ ଓ ଏହାର ଉପନଦୀଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ଅନେକ ବ୍ୟାରେଜ୍, ଆନିକଟ ଓ ଜଳ ସଂରଚନା ନିର୍ମାଣ କରି ଅଣ-ମୌସୁମୀ ସମୟରେ ନଦୀର ସ୍ୱାଭାବିକ ପ୍ରବାହକୁ ପ୍ରଭାବିତ କରିଛି। ଓଡ଼ିଶାର ମତାନୁସାରେ ଏହା ଫଳରେ ହୀରାକୁଦ ଜଳଭଣ୍ଡାରକୁ କମ୍ ପାଣି ପହଞ୍ଚୁଛି, ଯାହା ସେଚନ, ପାନୀୟ ଜଳ, ବିଦ୍ୟୁତ ଉତ୍ପାଦନ ଏବଂ ମହାନଦୀ ଡେଲ୍ଟାର ପରିବେଶ ଉପରେ ପ୍ରଭାବ ପକାଉଛି।

ଅନ୍ୟପକ୍ଷରେ, ଛତିଶଗଡ଼ ଦୀର୍ଘଦିନ ଧରି କହିଆସୁଛି ଯେ ସେ ନିଜ ଅଞ୍ଚଳରେ ଉପଲବ୍ଧ ଜଳର ବୈଧ ବ୍ୟବହାର କରୁଛି। ରାଜ୍ୟର ଯୁକ୍ତି ହେଉଛି ଯେ ବିକାଶ, ସେଚନ ଓ ପାନୀୟ ଜଳ ପ୍ରକଳ୍ପ ପାଇଁ ଜଳ ବ୍ୟବହାର କରିବା ତାହାର ଅଧିକାର ଏବଂ ଅନ୍ତିମ ଜଳ ବଣ୍ଟନ ସମ୍ପର୍କିତ ନିଷ୍ପତ୍ତି ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ନେବ।

ଅଦାଲତରୁ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ

୨୦୧୬ ମସିହାରେ ଓଡ଼ିଶା ସରକାର ସର୍ବୋଚ୍ଚ ନ୍ୟାୟାଳୟର ଦ୍ୱାରସ୍ଥ ହୋଇଥିଲା। ଏହାପରେ କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ମାର୍ଚ୍ଚ ୨୦୧୮ରେ ମହାନଦୀ ଜଳ ବିବାଦ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ଗଠନ କରିଥିଲେ। ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ଉଭୟ ରାଜ୍ୟର ଦାବି, ଜଳ ଉପଲବ୍ଧତା, ବ୍ୟବହାର ଏବଂ ବୈଜ୍ଞାନିକ ତଥ୍ୟର ପରୀକ୍ଷା କରୁଛି। ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହାର ଅନ୍ତିମ ରାୟ ଆସିନାହିଁ।

ବଦଳୁଥିବା ରାଜନୀତି, ବଦଳୁଥିବା ପରିବେଶ

ମହାନଦୀ ବିବାଦର ରାଜନୈତିକ ପକ୍ଷ ମଧ୍ୟ କମ୍ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ନୁହେଁ।

  • ୨୦୧୬–୨୦୧୮: ଛତିଶଗଡ଼ରେ ଡ଼. ରମଣ ସିଂହ (ବିଜେପି) ଏବଂ ଓଡ଼ିଶାରେ ନବୀନ ପଟ୍ଟନାୟକ (ବିଜେଡି)ଙ୍କ ସରକାର ଥିଲା। ଉଭୟ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟରେ ବାକ୍‌ଯୁଦ୍ଧ ତୀବ୍ର ଥିଲା।
  • ୨୦୧୮–୨୦୨୩: ଛତିଶଗଡ଼ରେ କଂଗ୍ରେସର ଭୂପେଶ ବଘେଲ ସରକାର ଆସିଲା, ଯେତେବେଳେ ଓଡ଼ିଶାରେ ନବୀନ ପଟ୍ଟନାୟକ ମୁଖ୍ୟମନ୍ତ୍ରୀ ରହିଲେ। ଏହି ସମୟରେ ବିବାଦ ମୁଖ୍ୟତଃ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ଓ ଆଇନଗତ ପ୍ରକ୍ରିୟାରେ ସୀମିତ ରହିଥିଲା, ଯଦିଓ ରାଜନୈତିକ ଅଭିଯୋଗ-ପ୍ରତିଅଭିଯୋଗ ଜାରି ରହିଥିଲା।
  • ୨୦୨୪ ପରେ: ଓଡ଼ିଶାରେ ବିଜେପି ସରକାର ଗଠନ ହେବା ପରେ ଉଭୟ ରାଜ୍ୟ ବିବାଦକୁ ସଂଘର୍ଷ ପରିବର୍ତ୍ତେ ଆଲୋଚନା ମାଧ୍ୟମରେ ସମାଧାନ କରିବାର ଇଚ୍ଛା ପ୍ରକାଶ କରିଛନ୍ତି। କେନ୍ଦ୍ରରେ ମଧ୍ୟ ବିଜେପି ସରକାର ଥିବାରୁ ସଂଳାପର ଏକ ନୂତନ ପର୍ଯ୍ୟାୟ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଛି।

ସମ୍ପ୍ରତି କେନ୍ଦ୍ରୀୟ ଜଳ ଶକ୍ତି ମନ୍ତ୍ରାଳୟର ପଦକ୍ଷେପରେ ଉଭୟ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟରେ ଉଚ୍ଚସ୍ତରୀୟ ବୈଠକ ହୋଇଛି, ଯେଉଁଥିରେ ବୈଜ୍ଞାନିକ ତଥ୍ୟ ଆଧାରରେ ସମାଧାନ ଖୋଜିବା ଏବଂ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲର ପ୍ରକ୍ରିୟାରେ ସହଯୋଗ ବଢ଼ାଇବା ଉପରେ ସହମତି ହୋଇଛି।

ସମାଧାନର ପଥ ସହଜ ନୁହେଁ

ବିଶେଷଜ୍ଞମାନଙ୍କ ମତରେ ଏହି ବିବାଦ କେବଳ ପାଣିର ପରିମାଣର ନୁହେଁ। ଏଥିରେ ମୌସୁମୀ ଓ ଅଣ-ମୌସୁମୀ ପ୍ରବାହ, ଭବିଷ୍ୟତର ସେଚନ ଯୋଜନା, ଶିଳ୍ପ ବ୍ୟବହାର, ଜଳବାୟୁ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଓ ପରିବେଶୀୟ ଆବଶ୍ୟକତାର ସନ୍ତୁଳନ ମଧ୍ୟ ଜଡ଼ିତ ରହିଛି।

ଅନ୍ତିମ ସମାଧାନ ଉଭୟ ରାଜ୍ୟର ପାରସ୍ପରିକ ସହମତି କିମ୍ବା ମହାନଦୀ ଜଳ ବିବାଦ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲର ଅନ୍ତିମ ରାୟ ମାଧ୍ୟମରେ ହିଁ ସମ୍ଭବ।

ସମୟରେଖା

  • ୨୦୧୬: ଓଡ଼ିଶା ଛତିଶଗଡ଼ର ନିର୍ମାଣ କାର୍ଯ୍ୟ ଉପରେ ଆପତ୍ତି ଉଠାଇ ସୁପ୍ରିମକୋର୍ଟରେ ମାମଲା ଦାଖଲ କଲା।
  • ୨୦୧୮: କେନ୍ଦ୍ର ସରକାର ମହାନଦୀ ଜଳ ବିବାଦ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ଗଠନ କଲେ।
  • ୨୦୧୮–୨୦୨୩: ଉଭୟ ରାଜ୍ୟ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ସମ୍ମୁଖରେ ନିଜ ନିଜ ଦାବି ଓ ବୈଜ୍ଞାନିକ ତଥ୍ୟ ଉପସ୍ଥାପନ କଲେ।
  • ୨୦୨୪: ଓଡ଼ିଶାରେ ସରକାର ପରିବର୍ତ୍ତନ ପରେ ଉଭୟ ରାଜ୍ୟ ମଧ୍ୟରେ ଆଲୋଚନାର ନୂଆ ପର୍ଯ୍ୟାୟ ଆରମ୍ଭ ହେଲା।
  • ୨୦୨୫–୨୦୨୬: କେନ୍ଦ୍ରର ମଧ୍ୟସ୍ଥତାରେ ଅନେକ ପର୍ଯ୍ୟାୟର ବୈଠକ ହୋଇଛି। ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲର କାର୍ଯ୍ୟବାହୀ ଜାରି ରହିଛି, କିନ୍ତୁ ଅନ୍ତିମ ରାୟ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆସିନାହିଁ।

ତଥ୍ୟ ବକ୍ସ

  • ନଦୀର ଲମ୍ବ: ପ୍ରାୟ ୮୫୧ କିମି
  • ଉତ୍ସ: ସିହାୱା, ଧମତରୀ (ଛତିଶଗଡ଼)
  • ମୁଖ୍ୟ ବନ୍ଧ: ହୀରାକୁଦ (ଓଡ଼ିଶା)
  • ବିବାଦର ମୁଖ୍ୟ ପ୍ରସଙ୍ଗ: ଉପର ପ୍ରବାହରେ ଜଳ ସଂରଚନା, ଅଣ-ମୌସୁମୀ ଜଳ ପ୍ରବାହ ଏବଂ ଜଳ ବ୍ୟବହାର
  • ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ ଗଠନ: ମାର୍ଚ୍ଚ ୨୦୧୮
  • ବର୍ତ୍ତମାନ ସ୍ଥିତି: ଅନ୍ତିମ ରାୟ ଅପେକ୍ଷାରତ; ଆଲୋଚନା ଓ ଟ୍ରିବ୍ୟୁନାଲ—ଉଭୟ ପ୍ରକ୍ରିୟା ସମାନାନ୍ତର ଭାବେ ଜାରି ରହିଛି।

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