भूल न जाना उनको ….

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साहित्य गगन के दो सितारों की आज है जयंती


आलेख : स्वराज्य करुण



भयंकर आपाधापी और चीख़-चिल्लाहटों के इस बेरहम दौर में आज भला कौन किसे बहुत शिद्दत से याद करता है ?हम अपने उन महान साहित्यकारों को भी भूलते जा रहे हैं ,जिन्होंने दुनिया की विभिन्न भाषाओं के साहित्य भंडार को अपनी बेहतरीन रचनाओं से आजीवन समृद्ध बनाने का अथक प्रयास किया। जरा आसमान की ओर देखिए।
आज साहित्य गगन के दो चमकदार ,अनमोल और अतुलनीय सितारों की जयंती है। उन्हें विनम्र नमन । विलक्षण प्रतिभा के धनी भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने भारत और लियो टॉलस्टॉय ने रूस के साहित्य भंडार को अपनी अनेकानेक कालजयी रचनाओं के अनमोल रत्नों से समृद्ध किया।


सिर्फ़ 35 साल की ज़िन्दगी में कर गए बड़ा कमाल


आधुनिक हिन्दी साहित्य की विशाल इमारत आज जिस ऊँचाई पर है ,उसकी बुनियाद तैयार करने में जिन साहित्यकारों ने अपना रचनात्मक योगदान दिया ,उनमें भारतेन्दु हरिश्चंद्र का नाम प्रथम पंक्ति में लिया जाता है। वह हिन्दी के युगप्रवर्तक साहित्यकार थे । उनका जन्म 9 सितम्बर 1850 को वाराणसी (उत्तरप्रदेश) में हुआ । सिर्फ लगभग 35 वर्ष की युवा अवस्था में 6 जनवरी 1885 को वाराणसी में ही उनका निधन हो गया । इस अल्पायु में उन्होंने कविता ,नाटक ,उपन्यास , निबंध और व्यंग्य लेखन के जरिए इतनी बड़ी संख्या में रचनाएं हिन्दी संसार को दी ,जो निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक कीर्तिमान है । लेकिन उनका उद्देश्य कीर्तिमान बनाना नहीं था बल्कि ब्रिटिश गुलामी में जकड़े तत्कालीन भारतीय समाज में साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से जागृति लाना उनका लक्ष्य था । मातृभाषा के प्रबल पक्षधर भारतेन्दु जी ने लिखा था –

निज भाषा उन्नति अहै ,सब उन्नति को मूल ,
बिन निज भाषा ज्ञान बिन ,,मिटत न हिय को शूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि ,सब गुन होत प्रवीन ,
पै निज भाषा ज्ञान बिन रहत दीन के दीन ।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के लिखे प्रमुख प्रहसनों में ‘अंधेर नगरी’ ‘ भारत दुर्दशा ‘ और ‘ वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ‘ उल्लेखनीय हैं । वह पत्रकार भी थे । उन्होंने ‘ कवि वचन सुधा ‘ ‘ बाल बोधिनी ‘ और ‘ ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन और सम्पादन किया । उनकी रचनाएं मुख्यतः ब्रज भाषा में हैं ,लेकिन खड़ी बोली के विकास की बुनियाद उन्होंने रखी । वह संस्कृत , बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं के भी ज्ञाता और विद्वान थे । उन्होंने विशाखदत्त के संस्कृत नाटक ‘ मुद्रा राक्षस’ का हिन्दी अनुवाद किया । बांग्ला नाटक ‘ विद्या सुंदरी ‘ का अनुवाद भी उन्होंने किया । भारत सरकार ने उनके सम्मान में वर्ष 1976में डाक टिकट भी जारी किया था ।

रूस के साहित्य महर्षि लियो टॉलस्टॉय



रूसी भाषा के महान उपन्यासकार लियो टॉलस्टॉय का जन्म रूस में 9 सितम्बर 1828 को यासनाया पोलयाना नामक स्थान में हुआ था । निधन 20 नवम्बर 1910 को रूस के एक छोटे से रेल्वे स्टेशन आस्तापोवो में अत्यंत विषम परिस्थितियों में हुआ । उनका कालजयी उपन्यास युद्ध और शांति आधुनिक विश्व साहित्य की अनमोल धरोहर है । चार खण्डों और डेढ़ हजार पृष्ठों के इस उपन्यास का प्रकाशन सन 1865 से 1869 के बीच हुआ । महात्मा गाँधी भी टॉलस्टॉय से काफी प्रभावित थे ।

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