दहेज के खिलाफ रंगमंच से उठी आवाज, ‘मया के मुंदरी’ ने रिश्तों की सौदेबाजी पर किया प्रहार

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‘रंग परब नाट्य श्रृंखला’ शुरू, तीन दिन में छह नाटक होंगे मंचित; पहले दिन सामाजिक कुरीति और पौराणिक कथा दोनों दिखीं

रायपुर, 9 सितंबर, वाय के न्यूज।
दहेज के लालच में विवाह जैसे रिश्ते के बदलते स्वरूप को रंगमंच पर प्रभावी ढंग से पेश किया गया। बुधवार को मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में शुरू हुई तीन दिवसीय ‘रंग परब नाट्य श्रृंखला’ की पहली प्रस्तुति ‘मया के मुंदरी’ ने दहेज प्रथा के खिलाफ सामाजिक संदेश दिया। 9 से 11 सितंबर तक चलने वाली इस श्रृंखला में रोजाना दो नाटकों का मंचन किया जा रहा है।

रिखी क्षत्रिय एवं समूह की प्रस्तुति ‘मया के मुंदरी’ में दहेज को लेकर परिवारों में पैदा होने वाले लालच और उसके रिश्तों पर पड़ने वाले असर को कहानी के जरिए सामने रखा गया। नाटक में बेटे की शादी को संस्कार और पारिवारिक संबंधों के बजाय धन-संपत्ति और गाड़ी हासिल करने का जरिया बनाने वाली मानसिकता पर सवाल उठाया गया।

कहानी में युवक और उसकी मां दहेज की मांग का विरोध करते हैं। वे आर्थिक रूप से कमजोर लड़की और उसके पिता के साथ खड़े होते हैं। अंत में युवक दहेज लेने से इनकार करते हुए लड़की से विवाह स्वीकार करता है। ग्रामीण रीति-रिवाजों के बीच होने वाला यह विवाह नाटक के उस संदेश को रेखांकित करता है कि शादी आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और समानता पर आधारित रिश्ता है।

पौराणिक कथा भी मंच पर आई

पहले दिन की दूसरी प्रस्तुति ‘हरित सागर’ रही। 7वीं शताब्दी की संस्कृत उत्तरकथा पर आधारित इस नाटक के लेखक और निर्देशक किशोर वैभव हैं। कथा भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई गई कथा से शुरू होती है, जिसे जलंधर के सुन लेने के बाद घटनाक्रम आगे बढ़ता है। इसके बाद माता पार्वती के श्राप और उससे मुक्ति की कथा को रंगमंचीय रूप दिया गया।

कलाकारों ने संवाद और अभिनय के जरिए पौराणिक प्रसंगों को मंच पर प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति ने सामाजिक विषय पर आधारित ‘मया के मुंदरी’ से अलग पौराणिक कथानक और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का रंगमंचीय पक्ष सामने रखा।

नाटक को समाज का दर्पण बताया

श्रृंखला के शुभारंभ अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का जीवंत दर्पण है। रंगमंच के जरिए सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएं और सांस्कृतिक परंपराएं प्रभावी ढंग से दर्शकों तक पहुंचती हैं।

कार्यक्रम में कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य प्रसन्ना अवस्थी और समाजसेवी उदयभान चौहान मौजूद रहे।

‘रंग परब नाट्य श्रृंखला’ का आयोजन 11 सितंबर तक होगा। इस दौरान अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और पौराणिक विषयों पर आधारित नाटकों का मंचन किया जाएगा।

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