आइए, प्रकृति से माफी मांगें

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आलेख- स्वराज्य करुण


हमारे देश में मानसून सक्रिय हो गया है। कहीं अच्छी बारिश हो रही है और कहीं भारी से बहुत भारी और कई इलाकों में हल्की -फुल्की ,क्योंकि पर्यावरण के संतुलन को हम सब मनुष्यों ने अपने हाथों से बिगाड़ा है। फलस्वरूप मौसम का संतुलन भी बिगड़ गया है। औद्योगिक विकास और शहरीकरण के तेज तूफ़ान में पहाड़, जंगल और गाँव उजड़ रहे हैं । मौसम के बिगड़ते संतुलन के बीच पर्यावरण के लड़खड़ाते पाँव हमें जिस रास्ते पर ले जा रहे हैं वह धरती पर मानव सभ्यता के विनाश का रास्ता है ।

कल तक जिन पहाड़ों में हरियाली की जो सघन चादर बिछी रहती थी,मनुष्य के लालची हाथों ने उसे फाड़ कर फेंक दिया है ।आवागमन की सुविधा बढ़ाने के लिए पहाड़ों को काटकर सड़कों और सुरंगों के निर्माण से भी पर्वतीय पर्यावरण के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है । रूस -यूक्रेन युद्ध और ईरान पर अमेरिकी -इजरायली हमलों में इस्तेमाल किए जा रहे तरह -तरह के जहरीले बमों से भले ही उधर का वायुमंडल और समुद्री इलाका प्रदूषित हो रहा हो, लेकिन उसका बुरा असर तो देर -सबेर पूरी दुनिया की हवाओं पर होगा, इसके संकेत भी हमें अभी से मिलने लगे हैं । पूरी दुनिया में उद्योगों के जहरीला धुआँ भी धरती के वायु मंडल को प्रदूषित कर रहा है । इन परिस्थितियों में शहरों से लेकर गाँवों तक प्लास्टिक और पॉलीथिन कचरे का बढ़ता फैलाव ‘दुबले पर दो आषाढ़’ और ‘नीम पर करेला चढ़े ‘जैसी बहुप्रचलित लोकोक्तियों की याद दिला रहा है । यह प्रदूषण शहरों में गंदे पानी की निकासी के लिए बनी नालियों को जाम कर रहा है ।

शहरों में भारी बारिश की वजह से सड़कों,गली -मोहल्लों, निचली बस्तियों और यहाँ तक कि सर्वसुविधा युक्त कॉलोनियों में भी बहुत अधिक मात्रा में जल जमाव से क्या -क्या परेशानियाँ होती हैं, आज के दौर में इसे हम हर साल मानसून के दौरान देखते आ रहे हैं और कई बार हम स्वयं इन मुसीबतों को झेलते भी हैं । इस वर्ष ऐसी मुसीबतें छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में भी देखी गई, जहाँ इतिहास में पहली बार एक दिन में हुई 400 मिलीमीटर बारिश ने जनता को बादल फटने जैसी विपदा की याद दिला दी ।वहाँ की सड़कें लबालब नदियाँ गईं, जिनमें नांवें चलने लगीं और एक -दो दिनों के लिए जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया । राजधानी रायपुर सहित अन्य कई शहरों में भी अत्यधिक बारिश से लोगों को काफी दिक्क़तें आईं ।

हमारी प्रकृति के लिए, धरती पर हरियाली के लिए और हमारी खेती -किसानी के लिए बारिश ज़रूर वरदान होती है, लेकिन अगर उसकी अति हो जाए तो वह कई मामलों में अभिशाप भी हो जाती है । मुम्बई और दिल्ली जैसे महानगरों में भी भारी वर्षा से सड़कें जलमग्न हो जाती हैं । तमाम तरह के आधुनिक तकनीकी संसाधनों के रहते हुए भी आख़िर क्यों हम अब तक शहरों में हर साल हो रही इस तरह की समस्याओं का कोई हल नहीं निकाल पाए? मानसून के आने के कुछ माह पहले ही शहरी इलाकों में पानी निकासी के लिए नालियों की बेहतर साफ़ सफाई का काम गंभीरता से होना चाहिए । यह संबंधित नगरीय निकायों की ज़िम्मेदारी है ।

अधिकांश नगरीय निकाय इस ज़िम्मेदारी को निभाते भी हैं, लेकिन नागरिकों की भी तो ज़िम्मेदारी है कि वे अपने घरों का कचरा सामने की नालियों में डालकर उन्हें जाम न करें । नगरीय निकायों को यह भी देखना चाहिए कि अगर किसी मोहल्ले की नालियों में प्लास्टिक की खाली बोतलें, पॉलीथिन के अनुपयोगी थैले आदि पड़े हुए हों, तो प्रशासन के सहयोग से उनके सामने के घरों पर सामूहिक जुर्माना लगाया जाए ।

औद्योगिक प्रदूषण की रोकथाम के लिए भी नियम कानून पहले से बने हुए हैं, जिनका पालन सख्ती से करवाया जाना चाहिए, ताकि हमारा वायुमंडल किसी उद्योग के विषैले धुएँ से प्रदूषित ना हो और ओजोन परत सुरक्षित रहे । देश और दुनिया की अर्थ -व्यवस्था के लिए तरह -तरह के उद्योग भी बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन उद्योगों के नाम पर जल, जंगल और ज़मीन जैसी अनमोल प्राकृतिक सम्पत्तियों का विनाश नहीं होना चाहिए । इनका इस्तेमाल पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए बहुत सोच -समझकर किया जाना चाहिए । लेकिन यह देखकर दुःख होता है कि ऐसा नहीं हो रहा है । पहाड़ और जंगल उजड़ते जा रहे हैं । नतीजा अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि और सूखे के रूप में हमारे सामने है । जंगलों की बेतहाशा कटाई से न सिर्फ़ मानव जीवन, बल्कि वहाँ रहने वाले पशु -पक्षियों का जीवन भी संकटग्रस्त हो गया है । अपने प्राकृतिक भोजन की तलाश में ग्रामीण इलाकों की मानव बस्तियों पर जंगली हाथियों के हमले की खबरें आती रहती हैं । बंदर, लंगूर और भालू भी गाँवों और शहरों में आने लगे हैं । इंदौर जैसे महानगर से लगी हुई बस्तियों में तेन्दुए भी देखे जाते हैं । जब जंगल ही नहीं बच रहे तो चारे -पानी के लिए ये वन्य जीव आख़िर जाएँ तो जाएँ कहाँ?
मानसून के इस मौसम में हमारे सामने एक मौका है -इन उजड़ते पहाड़ों और बेजान और वीरान होती पहाड़ियों को नया जीवन देने का , प्रकृति से माफी मांगने का भी यह एक बेहतर मौका है ,क्योंकि हमारी भौतिकवादी लालसाओं ने ही उसे उजाड़ने की कोशिश की है। उजड़ी हुई धरती पर , उसके उजड़े हुए पहाड़ों पर और टूटती बिखरती पहाड़ियों पर अधिक से अधिक पौधरोपण किया जाए तो उन्हें संजीवनी मिल सकती है।

जहाँ अच्छी बारिश हो रही हो ,वहाँ भी और जहाँ कम बरसात हो रही हो वहाँ भी, सब मिलकर पौधरोपण करें। लगाए गए पौधों के वृक्ष बनने तक उनकी बेहतर देखभाल करें। पहाड़ो और जंगलों में हरियाली होगी तो मौसम भी बेहतर होगा। वनोपजों के साथ हमें अच्छी वनौषधियाँ भी मिलेंगी। पशु -पक्षियों का जीवन भी नहीं उजड़ेगा। उजड़े हुए पहाड़ों और बेजान होती पहाड़ियों में ड्रोन तकनीक से भी तरह -तरह के बीजों का छिड़काव किया जा सकता है।

देश भर में संयुक्त वन प्रबंधन योजना के तहत लाखों वन प्रबंधन समितियाँ हैं ।उनमें करोड़ों सदस्य हैं। स्थानीय ग्रामीण ही उनके सदस्य और पदाधिकारी होते हैं। जनता की भागीदारी से वनों का संरक्षण और नये वनों का निर्माण लगभग ढाई दशक पहले आई इस योजना का मुख्य उद्देश्य है। क्या योजना के तहत गठित इन लाखों वन समितियों के करोड़ों सदस्य मिलकर अपने आस-पास के इन पर्वतों और पहाड़ियों को एक नई ज़िन्दगी देने का प्रयास नहीं कर सकते? बारिश के इस मौसम में यही एक मौका है उजड़ते पहाड़ों और वीरान होती पहाड़ियों को फिर से हरा -भरा बनाने का। आइए ,कोशिश करें।सामूहिक श्रमदान की विलुप्त होती परम्परा को भी फिर से साकार और सक्रिय करें। स्थानीय ग्राम पंचायतें भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान कर सकती हैं। यह हम सबकी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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